Strong Portfolio : अलग अलग इकोनॉमिक साइकिल और क्षेत्रीय जोखिम के बीच कैसे बनाएं मजबूत पोर्टफोलिया, एक्सपर्ट गाइड

लेखक: सचिन सावरिकर, मैनेजिंग पार्टनर, अर्थ भारत इन्वेस्टमेंट मैनेजर्स IFSC LLP

 

जो भारतीय निवेशक अब तक अपने पोर्टफोलियो को ज्यादातर घरेलू एसेट्स पर फोकस रखते थे, उन्हें अपनी पूंजी का एक हिस्सा वैश्विक बाजारों में लगाने पर विचार करना चाहिए। इससे वे अलग-अलग अर्थव्यवस्थाओं, सेक्टर और करेंसी में डाइवर्सिफिकेशन का लाभ उठा सकेंगे। करेंसी की चाल भी समय के साथ रिटर्न बढ़ाने में मदद कर सकती है, खासकर तब जब ग्लोबल एसेट्स को डॉलर की तुलना में रुपये में बढ़त का लाभ मिलता है।

हालांकि भारत में लंबी अवधि में मजबूत ग्रोथ के अवसर हैं, लेकिन केवल घरेलू बाजार में अधिक फोकस रहना डाइवर्सिफिकेशन के लाभ को सीमित कर सकता है।

पूर्व सोवियत संघ, अमेरिका और मिडिल ईस्ट जैसे क्षेत्रों में जियो-पॉलिटिकल घटनाएं यह दिखाते हैं कि वैश्विक स्तर पर डाइवर्सिफिकेशन कितना महत्वपूर्ण है। निवेशकों को ऐसे पोर्टफोलियो की जरूरत है जो अलग‑अलग इकोनॉमिक साइकिल में अच्छा प्रदर्शन कर सके और क्षेत्रीय जोखिमों को कम कर सके।

भारत अभी भी आकर्षक बाजार है, इसके पीछे कारण हैं – शहरीकरण, डिजिटल बदलाव और बढ़ती खपत। वहीं, अमेरिका तकनीक, इनोवेशन और गहरे कैपिटल मार्केट क्षमताओं के कारण एक प्रमुख बाजार बना हुआ है। इसलिए निवेशक का उद्देश्य यह होना चाहिए कि वह पूरे निवेश को किसी एक क्षेत्र में शिफ्ट करने की बजाय संतुलित वैश्विक निवेश बनाएं।

इसे 2 उदाहरण से समझते हैं:

कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और कमोडिटी में उतार‑चढ़ाव महंगाई, ब्याज दर और ट्रेड संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं, खासकर उन देशों में जो एनर्जी का आयात करते हैं, जैसे भारत। ऐसे हालात में, कमोडिटी और सोना जैसे वास्तविक एसेट्स अक्सर पोर्टफोलियो में डाइवर्सिफिकेशन लाने में मदद करती हैं। कमोडिटी साइकिल की बात करें तो एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर, सप्लाई चेन मजबूती और संसाधन दक्षता से जुड़े सेक्टर्स में अवसर भी पैदा करते हैं।

भारत में इंफ्रास्ट्रक्चर, मैन्युफैक्चरिंग और एनर्जी ट्रांजिशन के क्षेत्र में घरेलू अवसर अभी भी आकर्षक बने हुए हैं। वैश्विक निवेश के साथ चुनिंदा घरेलू निवेश करने से विशेष रूप से अस्थिर समय में ग्रोथ और स्थिरता का संतुलन बना रहता है।

निवेशकों को यह भी विचार करना चाहिए कि वे तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम, डिफेंस और एयरोस्पेस सेक्टर, डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर, रिन्यूएबल एनर्जी और सप्लाई चेन डाइवर्सिफिकेशन जैसे सेक्टर्स में भी निवेश करें। निवेशक इन अवसरों तक ग्लोबल इंडेक्स, सेक्टर फोकस्ड स्ट्रेटेजीज और डाइवर्सिफाइड इंटरनेशनल पोर्टफोलियो के माध्यम से पहुंच सकते हैं।

अस्थिरता को अपना दोस्त बनाएं

अस्थिर समय में अपने पोर्टफोलियो को फिर से संतुलित करना बहुत जरूरी है। जब मार्केट में तेजी से बदलाव आते हैं, तो पोर्टफोलियो का असाइनमेंट अपने निर्धारित स्तर से हट सकता है, जिससे अनजाने जोखिम बढ़ सकते हैं।

एक व्यवस्थित रिबैलेंसिंग अप्रोच लंबे समय तक स्ट्रैटेजिक एसेट अलोकेशन को बनाए रखने में मदद करता है। यह निवेशकों को उन एसेट्स को कम करने की सुविधा देता है जो बहुत अच्छा प्रदर्शन कर चुके हैं और उन एसेट्स में निवेश बढ़ाने की अनुमति देता है जिनकी कीमत में गिरावट आई है। इससे पोर्टफोलियो में डाइवर्सिफिकेशन बना रहता है और जोखिम कंट्रोल रहता है।

अनिश्चित समय में रणनीतिक अवसर भी पैदा होते हैं। जिया पॉलिटिकल झटकों के दौरान जिन एसेट्स की कीमतें गिर गई हैं, उनमें चुनी हुई निवेश राशि लगाने से, जैसे ही मार्केट स्थिर होती है और वल्युएशन सामान्य होते हैं, लंबे समय में अच्छे रिटर्न मिल सकते हैं।

अपने पोर्टफोलियो को सही तरीके से बनाना

एक अच्छे ढांचे वाला पोर्टफोलियो ग्रोथ और स्थिरता दोनों तरह की संपत्तियों को मिलाता है।
इक्विटी लंबी अवधि में पूंजी बढ़ाने में मदद करती है। फिक्स्ड इनकम आय और स्थिरता देता है। सोना अनिश्चित समय और मुद्रा के उतार‑चढ़ाव के दौरान सुरक्षा देने का काम करता है।

अंतरराष्ट्रीय निवेश जियोग्राफिक डाइवर्सिफिकेशन और उन वैश्विक सेक्टर्स में एक्सपोजर देते हैं, जो हमेशा घरेलू बाजार में उपलब्ध नहीं होते। इन सभी एसेट क्लास में संतुलित निवेश रखने से ऐसा पोर्टफोलियो बनता है जो अलग‑अलग मार्केट चक्र में भी प्रभावी ढंग से काम कर सकता है।

घरेलू बाजार से बाहर निवेश :

30 से 40 साल की उम्र के निवेशकों के लिए, अपने पोर्टफोलियो का लगभग 20 से 30 फीसदी हिस्सा वैश्विक बाजारों में निवेश करना, करेंसी, अर्थव्यवस्था और सेक्टर्स में अच्छा डाइवर्सिफिकेशन प्रदान कर सकता है।

निष्कर्ष :

जैसे-जैसे भारत की मध्यम वर्गीय आबादी अधिक समृद्ध होती जा रही है और देश की प्रति व्यक्ति आय बढ़ रही है, निवेशकों को अपनी संपत्ति की सुरक्षा और ग्रोथ के लिए हाई नेट वर्थ इन्वेस्टर्स की रणनीतियों को अपनाना और अपने अनुसार अनुकूलित करना जरूरी हो गया है। इस सफर की पहली कदम है- मल्टी एसेट और मल्टी कंट्री एक्सपोजर।

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