By Niveshvani Editorial Desk | अपडेटेड: 13 अक्टूबर 2025
भारत में मेट्रो नेटवर्क का विस्तार आधुनिकता और प्रगति की निशानी माना जाता है, लेकिन इंदौर मेट्रो और ग्रेटर नोएडा वेस्ट की तुलना यह दिखाती है कि देश में इंफ्रास्ट्रक्चर की प्राथमिकताएं ज़मीनी हकीकत से मेल नहीं खा रहीं।
🔹 इंदौर मेट्रो: चल रही है, पर सवारियां नहीं
आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, इंदौर मेट्रो ने सितंबर महीने में सिर्फ 5,067 यात्रियों को ही ढोया — यानी औसतन सिर्फ 170 यात्री प्रतिदिन।
अगस्त में यह संख्या 12,021 यात्रियों तक रही थी। इतने बड़े निवेश के बावजूद यह प्रोजेक्ट फिलहाल शहर की वास्तविक परिवहन ज़रूरतों को पूरा करने में विफल दिख रहा है।
मेट्रो चल रही है, स्टेशन बने हैं, लेकिन कोच खाली हैं। यह बताता है कि प्रोजेक्ट शुरू करने से पहले मांग और उपयोगिता का आकलन ठीक से नहीं किया गया।
🔹 ग्रेटर नोएडा वेस्ट: रोज़ लाखों की आवाजाही, फिर भी मेट्रो का इंतज़ार
वहीं दूसरी ओर, ग्रेटर नोएडा वेस्ट (नोएडा एक्सटेंशन) — जो एनसीआर के सबसे तेज़ी से बढ़ते इलाकों में से एक है — अब भी मेट्रो का इंतज़ार कर रहा है।
हर दिन लाखों लोग यहाँ से नोएडा, दिल्ली, गुड़गांव और गाज़ियाबाद के लिए सफर करते हैं। मेट्रो न होने की वजह से ज़्यादातर लोग कार, कैब और बसों पर निर्भर हैं।
नतीजा — ट्रैफिक जाम, बढ़ता प्रदूषण, और घंटों का सफर।
हालांकि यहां जनसंख्या घनत्व, रिहायशी प्रोजेक्ट्स और रोज़गार के अवसर काफी अधिक हैं, फिर भी यहां मेट्रो नेटवर्क की योजना अब तक ज़मीन पर नहीं उतर पाई है।
🔹 दो शहरों की दो तस्वीरें
जहां इंदौर मेट्रो यात्रियों की कमी से जूझ रही है, वहीं ग्रेटर नोएडा वेस्ट के लोग मेट्रो की मांग को लेकर लगातार आवाज़ उठा रहे हैं।
सोशल मीडिया पर #GreaterNoidaWestNeedsMetro अभियान तेज़ी से चल रहा है — लोगों का कहना है कि अगर कम सवारियों वाले शहर में मेट्रो चल सकती है, तो जहां हर दिन लाखों लोग सफर करते हैं, वहां क्यों नहीं?
🔹 नीति-निर्माताओं के लिए सबक
यह तुलना एक बड़ा सवाल खड़ा करती है —
“जहां सवारियां नहीं हैं वहां मेट्रो क्यों, और जहां लोग रोज़ जूझ रहे हैं वहां क्यों नहीं?”
सरकारों को अब नीतिगत प्राथमिकताओं को वास्तविक जरूरतों के हिसाब से तय करना होगा।
मेट्रो वहां बननी चाहिए जहां लोग चलें, न कि वहां जहां बस दिखावा हो।
निष्कर्ष:
भारत को यदि सच में स्मार्ट सिटीज़ और सस्टेनेबल ट्रांसपोर्ट सिस्टम की दिशा में आगे बढ़ना है, तो उसे ग्रेटर नोएडा वेस्ट जैसे इलाकों पर फोकस करना होगा, जहां रोज़ का सफर एक चुनौती बन चुका है।
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